.

.

Amala pitta management


अम्लपित्त चिकित्सा
(Management of Hyperacidity / APD)
-----------------------------------------------------------

अम्लपित्त रोग की चिकित्सा करते समय सबसे पहले यह जानना ज़रूरी होता है कि यह किन कारणों से पैदा हुआ है। कारणों का पता चलने पर यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि - रोगी की देह (विशेषकर आमाशय) में विकृति क्या है, कहाँ है, व कितनी है ? और, इसके बाद प्रयास किया जाना चाहिए, सम्प्राप्ति बनाने का ।

निदान
• अक्सर देखा जाता है कि अम्लपित्त का रोगी लम्बे समय तक, तथा/अथवा, अधिक मात्रा में ऐसे भोजन करने का आदी होता है, जो कि तीक्ष्ण, उष्ण, व क्षोभकारक हों;
• या फिर, रोगी लम्बे समय तक, तथा/अथवा, अधिक मात्रा में तीक्ष्ण, उष्ण, व क्षोभकारक (ऐलोपैथिक) दवाओं का सेवन करता होता है;
• कभी-कभी अम्लपित्त का हेतु दूषित / बासी भोजन, असमय भोजन, उचित रूप से न चबाया गया भोजन, ज़ल्दी-ज़ल्दी किया गया भोजन भी हो सकते हैं; तथा
• और, कभी आमाशय में होने वाला संक्रमण (H. pylori) भी अम्लपित्त व उससे होने वाले आमाशयिक व्रण (Peptic ulcer) का हेतु बनता है।

सम्प्राप्ति:
ऊपर बताए कारणों का कुल प्रभाव निम्न में से एक अथवा अधिक प्रकार से पड़ता है -

I. आमाशय में  बनने वाले पाचक-पित्त में अम्ल-घटक (Hcl) अधिक बनने लगता है;
II. आमाशयगत श्लेषम-कला (Gastric mucosa) व उसे आच्छादित करने वाली श्लेष्मा (Mucosal barrier) में क्षीणता व दौर्बल्य हो सकता है, जिससे कि आमाशयगत श्लेषम-कला-शोथ (Gastritis) व आम-पच्यमानाशय व्रण (Peptic ulcer) हो सकता है;
III. आमाशय की अनुलोम-गति (Peristaltic movement) में कुछ धीमापन भी हो सकता है, जिससे कि सेवित आहार व पाचक-रस आमाशय में आवश्यकता से अधिक देर तक पडे रहने से आहार-रस में अम्लता (Hyperacidity) व शुक्तता (Fermentation) पैदा होती है; व
IV. आमाशय में आवश्यकता से अधिक अम्ल (Hyperacidity) की विद्यमानता हो सकती है।

चिकित्सा
अब समय आता है, ऊपर बताए कारणों व सम्प्राप्ति के आधार पर चिकित्सा करने का। इसके लिए निम्न रीति से आगे बढ़ा जा सकता है- 

I. पाचक-पित्त में अम्ल-घटक (Hcl) की उत्पत्ति कम करने वाली औषधियों का प्रयोग:

सबसे पहला व महत्वपूर्ण कदम होता है, पाचक-पित्त में अम्ल-घटक (Hcl) की उत्पत्ति कम करने वाली उचित औषधियों का चुनाव (Selection of right drugs) व उनका प्रभावी मात्रा (Therapeutic dose) में प्रयोग। इस वर्ग में हालांकि अनेकों औषधियाँ हैं - शटी, पटोल, धत्तूर्, वासा, गुडूची, यवानी इत्यादि; तो भी सर्वाधिक प्रभावशाली औषधी है - शटी (Hedychium spicatum) । 

शटी के तिक्त (Antagonistic to acid) व कषाय रस (Astringent), तथा ग्राही (Anti-secretory) कर्म इसे आमाशयिक पाचक-पित्तगत अत्यधिक अम्लता (Excessive gastric Hcl) की उत्पत्ति को कम करने वाली एक प्रभावशाली औषधी बनाते हैं ।  इसकी तीक्ष्णता, लघुता, अनुष्णता, व ईषत् कटुता इसके उपरोक्त कर्मों में अतिरिक्त बल प्रदान करते हैं। अपने इन्हीं गुण-कर्मों के आधार पर शटी का भरपूर चिकित्स्कीय उपयोग न केवल अम्लपित्त (Hyperacidity) व परिणामशूल (APD), बल्कि छर्दि (Vomiting) व हिक्का (Hiccup) में भी किया जाता है। इसके व्रणरोपण (Ulcer healing) व शोथहर (Anti-inflammatory) कर्मों के आधार पर इसका आमाशय-शोथ (Gastritis) व परिणामशूल (APD), व आम-पच्यमानाशयगत व्रण (Peptic ulcer) की चिकित्सा में विशेष महत्व है।

II. आमाशयगत श्लेषम-कला (Gastric mucosal barrier) को बल देने वाली औषधियों का प्रयोग:

अम्लपित्त की चिकित्सा में दूसरा महत्वपूर्ण कदम होता है, ऐसी औषधियों का उपयोग जो आमाशयगत श्लेषम-कला (Gastric mucosal barrier) को बल देने वाली हों।  इस वर्ग में हालांकि अनेकों औषधियाँ हैं - मधुयष्टी, आमलकी, शतावरी, गुडूची, अभ्रक, ज़हरमोहरा इत्यादि; तो भी इनमें सर्वाधिक प्रभावशाली औषधी है - मधुयष्टी (Glycyrrhiza glabra) । 

मधुयष्टी के शीत (Anti-enzymatic) व मधुर रस (Antacid) इसे आमाशयगत श्लेषम-कला (Gastric mucosal barrier) को बल देने वाली विशेष औषधी बनाते हैं ।  दूसरी ओर, इसकी गुरुता (Anabolic action) व स्निग्धता (Promotes mucous secretion)  इसे एक श्रेष्ठ रसायन बनाने के साथ-साथ एक प्रभावशाली व्रणरोपक औषधी भी बनाते हैं ।  यही कारण है कि जहाँ एक ओर सर्वांग धातुक्षय (General debility / tissue degeneration) की अवस्था में मधुयष्टी का रसायन के रूप में भूरिशः उपयोग किया जाता है, वहीं व्रण (Wound / ulcer) में एकदेशीय (Local) धातुक्षय (Tissue death / necrosis) की अवस्था में भी मधुयष्टी का व्रणरोपक औषधी के रूप में बहुतायत से उपयोग होता है। अपने इन्हीं गुण-कर्मों के आधार पर मधुयष्टी का उपयोग न केवल अम्लपित्त (Hyperacidity) व परिणामशूल (APD), बल्कि छर्दि (Vomiting),  आमाशय-शोथ (Gastritis), व आम-पच्यमानाशयगत व्रण (Peptic ulcer) की चिकित्सा में भरपूर उपयोग किया जाता है ।

III. आमाशय की अनुलोम-गति (Peristaltic movement) बढ़ाने वाली औषधियों का उपयोगः

इस विकृति के निराकरण के लिए ऐसी औषधियों के उपयोग की आवश्यकता होती है जो कि आमाशय की अनुलोम-गति को तीव्र करते (Stimulate peristalsis) हुए उसमें मौजूद पच्यमान-आहार व आहार-रस (Gastric contents) को शीघ्रता से पच्यमानाशय ( Duodenum) में प्रविष्ट कराएँ (Expedite gastric emptying)। इस वर्ग में यद्यपि अनेकों औषधियाँ हैं - भृंगराज, शटी, मयूरपिच्छ, हरीतकी, निशोथ, पौदीनक, शुण्ठी इत्यादि; तो भी भृंगराज (Eclipta alba) इन सब में अपना विशेष महत्व रखती है ।  

भृंगराज के कटु (Stimulant) व  तिक्त (Acid antagonistic) रस इसे आमाशय की अनुलोमगति बढ़ाने वाली (Peristaltic stimulant) वाली विशेष औषधी बनाते हैं ।  दूसरी ओर, इसकी लघुता व उष्णता (Metabolic stimulant action) तथा रूक्षता (Anti-secretory) इसके उपरोक्त कर्मों में विशेष सहायता (Synergistic action) प्रदान करते हैं।  यही कारण है कि भृंगराज का उपयोग अम्लपित्त (APD) के साथ-साथ छर्दि (Vomiting) में भी किया जाता है। यही नहीं, भृंगराज अग्न्याशयगत पाचक-तत्व (Pacreatic trypsin) का अवरोध करते हुए अग्न्याशय-शोथ (Pancretitis) में भी लाभकारी सिद्ध होता है।

IV. आमाशयगत अत्यधिक अम्ल का निराकरण करने वाली (Acid neutralizing) औषधियों का उपयोगः

इस विकृति के निवारण के लिए ऐसी औषधियों के उपयोग की आवश्यकता होती है जो कि आमाशयगत अत्यधिक अम्ल का निराकरण (Neutralize excessive gastric Hcl) करें। इस वर्ग में मुख्य औषधियाँ हैं - मुक्ताशुक्ति, मुक्ता, प्रवाल, गुडूची, स्वर्जिकाक्षार, निम्बुक, अभ्रक इत्यादि । फिर भी, मुक्ताशुक्ति (Mother of pearl) कई कारणों से इस वर्ग की एक आदर्श औषधी है ।  

मुक्ताशुक्ति का अम्लता-निरोधक (Acid-neutralizing) कर्म इसे आमाशय में मौजूद अत्यधिक अम्लता-निवारण (Acid antagonism) करने के लिए एक आदर्श औषधी बनाता है। यही कारण है कि मुक्ताशुक्ति का उपयोग अम्लपित्त (APD) के साथ-साथ छर्दि (Vomiting), पित्त-प्रधान अरुचि (Dyspepsia), व पित्तज-परिणामशूल (Peptic ulcer) में भी किया जाता है।

अम्लपित्त होने की स्थिति में, प्रत्येक रोगी में सम्प्राप्ति के आधार पर, उपरोक्त चारों वर्गों में से किसी एक अथवा अनेक औषधियों का युक्तपूर्वक प्रयोग अपेक्षित लाभ देता है।

अनुभव बताता है कि, क्योंकि अम्लपित्त के प्रत्येक रोगी में, सम्प्राप्ति के लगभग सभी घटक, कमोबेश रहते ही हैं, अतः उपरोक्त चारों वर्गों में से एक-एक मुख्य औषधी का चुनाव करके, उनका युक्तिसंगत मात्रा व कल्पना में उपयोग, इस रोग की चिकित्सा में आशातीत लाभ देता है। 

इसी आधार पर हमने, प्रत्येक वर्ग में से एक-एक मुख्य औषधी का चुनाव करके, चार मुख्य औषधियों का औषध-योग तैयार किया, तथा इसका अम्लपित्त (Hyperacidity), परिणामशूल (Acid Peptic Diseases), आम-पच्यमानाशयगत व्रण (Peptic ulcer), अजीर्ण (Dyspepsia), छर्दि (Vomiting), आमाशय-कला-शोथ (Gastritis) इत्यादि में, असंख्य रोगियों में, लगभग तीन दशक तक सफलतापूर्वक प्रयोग किया, व इससे आशातीत लाभ पाया।

इस औषध-योग को हमने लोसिड टैबलेट (LOCID Tablet) नाम दिया।

----------------------------------------------------
LOCID Tablet
(लोसिड) टैबलेट

घटकः
• शटी इक्स्ट्रैक्ट 250 mg (2.5 ग्राम शटी चूर्ण के बराबर)
• मधुयष्टी इक्स्ट्रैक्ट 225 mg (2.25 ग्राम मधुयष्टी चूर्ण के बराबर)
• भृंगराज इक्स्ट्रैक्ट 175 mg (1.75 ग्राम भृंगराज चूर्ण के बराबर)
• मुक्ताशुक्ति भस्म  150 mg

मात्रा: 1-2 टैबलेट, भोजन के तत्काल बाद, दिन में तीन बार
निर्देश: अम्लपित्त (Hyperacidity), परिणामशूल (Acid Peptic Diseases), आम-पच्यमानाशयगत व्रण (Peptic ulcer), अजीर्ण (Dyspepsia), छर्दि (Vomiting), आमाशय-कला-शोथ

Dr.vasishth md kayachikitsa

irregular menstrual cycles treatment

Payal K:
Dear Vaidyas...one case of 28 yr old married female, k/c/o bil pcod has irregular menstruation , pittapradhan kaphanubandha prakruti, has history of parikartika ( fissures) on and off, stress .initially was on allopathic HRT for menstruation. When she started taking Ayurveda meds she felt better and had one cycle after 40 days..
   Now again the same problem..more than 50 days have passed no period yet

Can anyone suggest treatment experiences?
  In fairly many patients they get periods regularly for some months and then it gets delayed.

Chetan:
Dear madam

PcOs:
Vaat is blocked by kafa specifically apan Vaayu

Nityaanuloman
Kafavaatshamak Bastis
RAS dhatu gat Aampachan
Is a general sutra

But your patient seems to have Kafa and pitta both blocking Vaata
So Start with shadangodak for pachan
Hingwastak for anuloman 7 days atleast
And then jump on Bastis

Vinaya Ballakur:
Have positive results with Rasa Shala preparation kuberaksha yoga.
Just one or two pills with hot water in the evening is sufficient to regularise periods. Only thing is bleeding must be monitored. If heavy it can be discontinued during periods and then started after complete cessation for the next period to appear on time.

The other drug that really works is Chandraprabhavati in one gm dosage BD. It is a complete medicine that is vatalomaka, shothahara, rasayana and tridoshamaka. Works better with a guggulu preparation that is Lekhan, shothahara and abhyantara vranashodhaka like Triphala guggulu, kanchanar guggulu etc.

Another important lekhan and abhyantara vranashodhaka is varunadi kwatha. Sukumara kwatha restores hormonal balance.

I usually combine combine two or three of the above mentioned medicines.

Boiled water consumption should be advised.

Some counseling may be required. If facing personal problems those needed to be sorted out with family.

Her symptoms are those of pitta aggravation.
Pitta shamaka  chikitsa will help her.
Praval bhasma, Mukta bhasma can be given. Kamdudha ras is a great combination.
Sukumara ghritha, shatavari churna are other medicines that can be combined.
Himsagar thaila application over head can be recommended.

Stop rajasika and tamasika items and advice saatvika diet and lifestyle.

Home remedie for menstrual pain

Remedy for mensuration pain or cramps: Needed: 100ml of water 1 table spoon of Fennel Seeds also called Saunf in hindi and Sombu in tamil. 1/2 spoon of sugar or 1 spoon of palm jaggery or brown sugar. What to do: Take this 100ml of water and allow it to boil. During light heat, add this 1 table spoon of this fennel seed. allow it to boil still the water cosisitancy becomes half of the qty and color changes. Then add either palm jaggery sugar 1 spoon or 1/2 white sugar. filter it.. and drink this Kashayam during your mensuration time. By drinking regularly you will not have cramps or severe pain.

Menopausal complaints and treatment

Vinaya Ballakur:
I  request all Vaidyas for discussion on the complaints of women in  premenopausal and menopausal women please.

Our texts do not describe the dosha aggravation and rogas occuring as a result of hormonal changes  during this phase.
But we commonly find hot flushes, obesity, mood swings, depression , fatigue and other such symptoms .

How to understand from dosha dushya perspective  and how we can best manage the transition smoothly for women.

Kindly discuss.

Applicative theory will let us know why and how certain medicines like Arogya Vardhani and Chandraprabhavati vati that Vd.Gopiji suggested work.

My guru late Shripathi Rao Garu used to say , you can successfully practice if you know how to use Arogyavardhani and Chandraprabhavati even in the absence of other medicines.
Such great potential these two drugs have.

Dr.ravndr:
Ritu aagamanam (rajo darshanam) and Ritu antam (Rajah kshayam) are two rise and fall in physiology related to 'aartava dhaatu'. It never impresses either it's absence or production at an ouset. Nevertheless, it exhibits it's functional replication in the form of monthly vaginal bleedy secretions called 'menses' or menstruation. Along with this, there are other features all over the body in general and related to genital tract in particular.

An absence of menses indicates alterations in the state of aartava dhaatu and it's influence on the body. These only are climacteric changes and the word 'menopause' is considered as a misnomer.

As said in the beginning Stanza, madhya vayah is influenced Pitta and menopause is only a 'ritu sandhi' as we read for 'kaala Vaayu

Here, recollect please on-
"Chaya prakopa prashamaa vaayo greeshmaadishu thrishu, varshaadishu su pittasya, shleshmanah shishiraadishu"

Sanchita vaayu during madhyama vayah  becomes vitiated when vaardhakya begins and carries away the swasthaana Sanchita pitta all over the body only to show the clinical picture as we see or read.

Therefore, vaata-pitta shaamaka  chikits, not pitta shaamaka chikits alone is not satisfied.

Vinaya Ballakur:
Rajonivruthi is not pathological unless premature or abrupt with hysterectomy.
Otherwise it's svabhavika.

This is the samprapti that Ravinder sir derived.

"Sanchita vaayu during madhyama vayah  becomes vitiated when vaardhakya begins and carries away the swasthaana Sanchita pitta all over the body only to show the clinical picture as we see or read."

This explains excessive sweating, hot flushes, vaginal dryness, mood swings, insomnia , fatigue.

What about weight gain?
Vardhakya is the period of vata , so weight loss must be observed. 
🙏🙏

Vd. Uday Patil:
Menopausal Weight gain is vikrut med sanchiti, not sarva dhatu vruddi.
It's vikrut vaat lakshan only.

Dr Kaveti Rajyalakshmi:
As the upadhatu of Rasa dhatu formation is stopped/ reduced (delayed cycles) causes rasa dhatu vriddhi and uttaradhatu vriddhi. Which results in agninasa, vyanga

Vinaya Ballakur:
Very much observed with another upadhatu stanya too.
When Stana pana for baby is practised by mother she loses weight.
Those who do not or cannot are observed to gain unhealthy weight.

Dr.ravndr:
This case is not a routine in all the women. 'Ritu vaiparitya' during 'sandhi vayo kaala' when a woman exposed to V-P kara 'mithya-ahaara vihaara'.

In a case of such 'vaishamya', association of  'aamatva' to the said doshaas is also possible. There need not be involved Kapha in the beginning which sebsequently may be effected or may not be.

That's why every woman of MS is not an obese.

Woman is a more responsible person then a man do. Socio-economic conditions influences her a lot. Therefore, effect of rajo guna influences her a lot.

Rajo guna is duo status of both Vaayu and Agni therefore the said clinical picture.

For management, in gist I can say that Saatvikaahaara and Satvaavajaya are the two major components and Medhya rasaayana is a complimentary to it.

Rishi Vashishth:
Vayu has primary role in weight gain,  which is why  in charaka samhita sutra sthana,  where chikitsa of sthoulya is mentioned,  the first word of the chikitsa sutra is vataghna

Dr.ravndr:
There is no relationship to upadhaatu roopa aartava and Uttara dhaatu vriddha-avastha as per my conceptual study as it has no 'kaarmukata' of 'prasaadana' to Uttara dhaatu Similarly, loss of weight during stanapaana is only because of less supply to meet the demand.

Home remedies

*Remedies*

*Vomiting*
1. take 2 cardamoms and roast on a dry pan. Powder it and add a tsp of honey. Take this frequently
2. Sip a glass of chilled limejuice slowly
3. Ginger tea
4. Add honey into a glass of water and drink sip by sip

*Urine infection*
1. In 8 ounce water put 1 tsp bicarbonate of soda andand drink it
2. Plenty of water
3. Cranberry juice
4. Barley water

*Warts*
1. Rub castor oil and continue doing so for a couple of months
2. Rub raw potato on affected area several times daily (continue for at least 2 weeks)
3. Rub cut onions on the warts
4. Apply papaya or pineapple juice

*Piles*
1. Drink radish juice twice a day (start at 1 cup then increase to 2)
2. Soak 3 or 4 figs in a glass of water and soak overnight. Drink in the morning on a empty stomach

*Indigestion*
1. Have 1 tsp turmeric powder in a glass of warm milk every day

*Arthritis*
1. Make a paste from turmeric and apply to area
2. Drink milk with turmeric

*Headache*
1. Take 5 almonds along with hot milk in your daily diet
2. Drink grape juice
3. Mix a gram of black pepper with honey and milk and take 2 or 3 times daily
4. Apply almond paste of the forehead
5. Eat an Apple with a little salt on an empty stomach (great for migraines)
6. Drink turmeric milk with black pepper

*Backache*
1. Apply ginger paste on affected area

*Sore throat*
1. Add a tsp of cumin seeds and a few pieces of dry ginger to a glass of boiling water. Simmer and drink when cool

*Asthma remedy*
1. Boil ajmo in water and inhale the steam

*Blocked nose*
1. Take a tbsp of crushed ajmo and tie in a cloth and inhale

*Dry cough*
1. Add a gram of turmeric to a tsp of honey
2. Keep chewing cardamom
3. Grate the zest and take the juice of 2 lemons and an inch of grated ginger in a pan. Simmer and drink with a spoonful of honey

*Cold*
1. Mix a gram or cardamom powder with a tsp of honey
2. In a cup of tea add ginger, clove, bay leaf and black pepper. Take twice daily. (Reduce as cold disappears)

Popular Posts