Oral candidiasis

A case of Lichen with prurigo nodularis

Vijaya Rani:
Pt age 64c/o  severe itching
H/o 30 yers back she was effected by lichen planus
Since that on wads she was under medication
Till now she didn't get relief but spread allover body,even tongue also effects
H/o htn and DM since 20 years
Madyama sareera
Mala nirmal
Mutra normal
Pitta kapha Nadi
App  madyasta
Guide me drs

Lichen with prurigo nodularis...

Here Kapha Hara(kandu Hara) with raktha sodhaka treatment as well as anti inflammatory management

Histanin (KAPL)
Grab(Green Remedies)
Tiktakam kashyam or if weight is more  asanadhi kashayam

External application
Yastimadhu taila and eladi taila mix
Neem alovera contain soap

Continue diabetic and htn Medication

Avoid masala oily fry junk brinjal curd pickles nonveg...

Advise to take plenty of buttermilk with ginger and jeera

Dr.suresh Jakotia:
Apamarg masi apply with cocunut oil along with other Like A.V.VATI.

A case of oral candidiasis

Rishi Vashishth:

Case 1=A 2 years and 8 months old kid,  suffering from 5 months with oral thrush. Weight 12kgs. First approached an allopathic Doctor,  it subsided,  recurred again and again.  At that time the tongue coating was yellowish white. Now the tongue coating is black.  The child has been suffering from acute gastro enteritis repeatedly as well(once a month at least) and recurrent respiratory tract infections(once a month atleast).  The child is bottle fed since birth,  now kshirannada. Agni is visham,  as the kid at times eats well and at times has anannabhilasha. Had a habit of mridbhakshan too,  but now has grown over it and doesnt have that anymore. Please  guide, how to approach such a case.

Vinaya Ballakur:
For this child , krimi, kushtha and Pandu chikitsa have to be planned. Oral hygiene must be maintained. Avoid, sweets,chocolates , ice cream.

May give Vidangasava 5 ml twice daily and gandhaka rasayana 125 mg twice daily for about 10 to 15 days.
Then Arvindasava 10 ml twice daily for two months.
Jihwa nirlekhana is a must. Neem paste for brushing teeth twice a day. After brushing and tongue cleaning a light application of arimedasthailam can be advised.
Advise to reduce milk intake and include more solid food. Ragi based foods are best for this age group. Papayas and pomegranates among fruits and easily digestible gourd vegetables among vegetables should be gradually introduced.

Dr Kaveti Rajyalakshmi:
Check milk for adulteration. Advice to add gripe water or ajamodarka to milk.
Sitopaldi churna with madhu+ ghrita bedtime is my DOC

Kashaiah Vasam:
It is starting oral candidiasis infected turns into chronic and mrudbhakshanajanya pandu
1.Give Bannison Syp.5ml bid
Syp. LIVOMYN 5ml bid

Yashti madhu churna with madhu fo r

Oral cavity applying

Dr.suresh Jakotia:
Tankan bhasma with honey apply on tongue.

Sira granthi treatment

Kashaiah Vasam:
Is it varicose veins

Patient male 70 years former no h/o DM and known htn on medication

Dr Abhay Shah:
Do जलोकावचारण with your regular medicines

Yes... siragranthi...( Varicose)

Foot elevation...

Vatarakta chikitsa..
Sira vyadhana or jalukavacharana

.s.s Sir:
Loknath Ras + saindhav Lavana with Tambool Swaras in the morning...

Dr.pradp Noori:
Jalokavacharana is indicated theories. But it is not the right one to do in many cases it is srothavarodha so think about obstruction removal rather than vimargagamana complications .
A genral used prescription is
Sahacharadi thailam ext application (pratilomagati )
Sockings till knee life long .
Internal Guggulupanchapalam
Vriddhivadhika vati both 1 gn per day  with Sahacharadi kashayam 15 ml before meals and Ksheerbala tailam 101 avartini twice after food .
For 1 to 2 months . Know that it's is a yapya vyadhi .

Dr,Dilkhush (DK) Tamboli:
1.सहचर तेल
2.पांडू चिकित्सा
3.कुष्ठ चिकित्सा
4.रक्तपित्त चिकित्सा

Its my approach......

Pratiloma gati abhyanga...( Opposite direction massage)( sahacharadhi and pinda mix)..

Sahacharadhi 10 drops taila along with milk or sahacharadhi 21 soft gels also very effective..

Reason... sahacharadhi is very effective in lower extermitie disorders...as well as Dashamoola, kushta, Ela etc herbs used in this oil are useful to relieve pain.

Amala pitta management

अम्लपित्त चिकित्सा
(Management of Hyperacidity / APD)

अम्लपित्त रोग की चिकित्सा करते समय सबसे पहले यह जानना ज़रूरी होता है कि यह किन कारणों से पैदा हुआ है। कारणों का पता चलने पर यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि - रोगी की देह (विशेषकर आमाशय) में विकृति क्या है, कहाँ है, व कितनी है ? और, इसके बाद प्रयास किया जाना चाहिए, सम्प्राप्ति बनाने का ।

• अक्सर देखा जाता है कि अम्लपित्त का रोगी लम्बे समय तक, तथा/अथवा, अधिक मात्रा में ऐसे भोजन करने का आदी होता है, जो कि तीक्ष्ण, उष्ण, व क्षोभकारक हों;
• या फिर, रोगी लम्बे समय तक, तथा/अथवा, अधिक मात्रा में तीक्ष्ण, उष्ण, व क्षोभकारक (ऐलोपैथिक) दवाओं का सेवन करता होता है;
• कभी-कभी अम्लपित्त का हेतु दूषित / बासी भोजन, असमय भोजन, उचित रूप से न चबाया गया भोजन, ज़ल्दी-ज़ल्दी किया गया भोजन भी हो सकते हैं; तथा
• और, कभी आमाशय में होने वाला संक्रमण (H. pylori) भी अम्लपित्त व उससे होने वाले आमाशयिक व्रण (Peptic ulcer) का हेतु बनता है।

ऊपर बताए कारणों का कुल प्रभाव निम्न में से एक अथवा अधिक प्रकार से पड़ता है -

I. आमाशय में  बनने वाले पाचक-पित्त में अम्ल-घटक (Hcl) अधिक बनने लगता है;
II. आमाशयगत श्लेषम-कला (Gastric mucosa) व उसे आच्छादित करने वाली श्लेष्मा (Mucosal barrier) में क्षीणता व दौर्बल्य हो सकता है, जिससे कि आमाशयगत श्लेषम-कला-शोथ (Gastritis) व आम-पच्यमानाशय व्रण (Peptic ulcer) हो सकता है;
III. आमाशय की अनुलोम-गति (Peristaltic movement) में कुछ धीमापन भी हो सकता है, जिससे कि सेवित आहार व पाचक-रस आमाशय में आवश्यकता से अधिक देर तक पडे रहने से आहार-रस में अम्लता (Hyperacidity) व शुक्तता (Fermentation) पैदा होती है; व
IV. आमाशय में आवश्यकता से अधिक अम्ल (Hyperacidity) की विद्यमानता हो सकती है।

अब समय आता है, ऊपर बताए कारणों व सम्प्राप्ति के आधार पर चिकित्सा करने का। इसके लिए निम्न रीति से आगे बढ़ा जा सकता है- 

I. पाचक-पित्त में अम्ल-घटक (Hcl) की उत्पत्ति कम करने वाली औषधियों का प्रयोग:

सबसे पहला व महत्वपूर्ण कदम होता है, पाचक-पित्त में अम्ल-घटक (Hcl) की उत्पत्ति कम करने वाली उचित औषधियों का चुनाव (Selection of right drugs) व उनका प्रभावी मात्रा (Therapeutic dose) में प्रयोग। इस वर्ग में हालांकि अनेकों औषधियाँ हैं - शटी, पटोल, धत्तूर्, वासा, गुडूची, यवानी इत्यादि; तो भी सर्वाधिक प्रभावशाली औषधी है - शटी (Hedychium spicatum) । 

शटी के तिक्त (Antagonistic to acid) व कषाय रस (Astringent), तथा ग्राही (Anti-secretory) कर्म इसे आमाशयिक पाचक-पित्तगत अत्यधिक अम्लता (Excessive gastric Hcl) की उत्पत्ति को कम करने वाली एक प्रभावशाली औषधी बनाते हैं ।  इसकी तीक्ष्णता, लघुता, अनुष्णता, व ईषत् कटुता इसके उपरोक्त कर्मों में अतिरिक्त बल प्रदान करते हैं। अपने इन्हीं गुण-कर्मों के आधार पर शटी का भरपूर चिकित्स्कीय उपयोग न केवल अम्लपित्त (Hyperacidity) व परिणामशूल (APD), बल्कि छर्दि (Vomiting) व हिक्का (Hiccup) में भी किया जाता है। इसके व्रणरोपण (Ulcer healing) व शोथहर (Anti-inflammatory) कर्मों के आधार पर इसका आमाशय-शोथ (Gastritis) व परिणामशूल (APD), व आम-पच्यमानाशयगत व्रण (Peptic ulcer) की चिकित्सा में विशेष महत्व है।

II. आमाशयगत श्लेषम-कला (Gastric mucosal barrier) को बल देने वाली औषधियों का प्रयोग:

अम्लपित्त की चिकित्सा में दूसरा महत्वपूर्ण कदम होता है, ऐसी औषधियों का उपयोग जो आमाशयगत श्लेषम-कला (Gastric mucosal barrier) को बल देने वाली हों।  इस वर्ग में हालांकि अनेकों औषधियाँ हैं - मधुयष्टी, आमलकी, शतावरी, गुडूची, अभ्रक, ज़हरमोहरा इत्यादि; तो भी इनमें सर्वाधिक प्रभावशाली औषधी है - मधुयष्टी (Glycyrrhiza glabra) । 

मधुयष्टी के शीत (Anti-enzymatic) व मधुर रस (Antacid) इसे आमाशयगत श्लेषम-कला (Gastric mucosal barrier) को बल देने वाली विशेष औषधी बनाते हैं ।  दूसरी ओर, इसकी गुरुता (Anabolic action) व स्निग्धता (Promotes mucous secretion)  इसे एक श्रेष्ठ रसायन बनाने के साथ-साथ एक प्रभावशाली व्रणरोपक औषधी भी बनाते हैं ।  यही कारण है कि जहाँ एक ओर सर्वांग धातुक्षय (General debility / tissue degeneration) की अवस्था में मधुयष्टी का रसायन के रूप में भूरिशः उपयोग किया जाता है, वहीं व्रण (Wound / ulcer) में एकदेशीय (Local) धातुक्षय (Tissue death / necrosis) की अवस्था में भी मधुयष्टी का व्रणरोपक औषधी के रूप में बहुतायत से उपयोग होता है। अपने इन्हीं गुण-कर्मों के आधार पर मधुयष्टी का उपयोग न केवल अम्लपित्त (Hyperacidity) व परिणामशूल (APD), बल्कि छर्दि (Vomiting),  आमाशय-शोथ (Gastritis), व आम-पच्यमानाशयगत व्रण (Peptic ulcer) की चिकित्सा में भरपूर उपयोग किया जाता है ।

III. आमाशय की अनुलोम-गति (Peristaltic movement) बढ़ाने वाली औषधियों का उपयोगः

इस विकृति के निराकरण के लिए ऐसी औषधियों के उपयोग की आवश्यकता होती है जो कि आमाशय की अनुलोम-गति को तीव्र करते (Stimulate peristalsis) हुए उसमें मौजूद पच्यमान-आहार व आहार-रस (Gastric contents) को शीघ्रता से पच्यमानाशय ( Duodenum) में प्रविष्ट कराएँ (Expedite gastric emptying)। इस वर्ग में यद्यपि अनेकों औषधियाँ हैं - भृंगराज, शटी, मयूरपिच्छ, हरीतकी, निशोथ, पौदीनक, शुण्ठी इत्यादि; तो भी भृंगराज (Eclipta alba) इन सब में अपना विशेष महत्व रखती है ।  

भृंगराज के कटु (Stimulant) व  तिक्त (Acid antagonistic) रस इसे आमाशय की अनुलोमगति बढ़ाने वाली (Peristaltic stimulant) वाली विशेष औषधी बनाते हैं ।  दूसरी ओर, इसकी लघुता व उष्णता (Metabolic stimulant action) तथा रूक्षता (Anti-secretory) इसके उपरोक्त कर्मों में विशेष सहायता (Synergistic action) प्रदान करते हैं।  यही कारण है कि भृंगराज का उपयोग अम्लपित्त (APD) के साथ-साथ छर्दि (Vomiting) में भी किया जाता है। यही नहीं, भृंगराज अग्न्याशयगत पाचक-तत्व (Pacreatic trypsin) का अवरोध करते हुए अग्न्याशय-शोथ (Pancretitis) में भी लाभकारी सिद्ध होता है।

IV. आमाशयगत अत्यधिक अम्ल का निराकरण करने वाली (Acid neutralizing) औषधियों का उपयोगः

इस विकृति के निवारण के लिए ऐसी औषधियों के उपयोग की आवश्यकता होती है जो कि आमाशयगत अत्यधिक अम्ल का निराकरण (Neutralize excessive gastric Hcl) करें। इस वर्ग में मुख्य औषधियाँ हैं - मुक्ताशुक्ति, मुक्ता, प्रवाल, गुडूची, स्वर्जिकाक्षार, निम्बुक, अभ्रक इत्यादि । फिर भी, मुक्ताशुक्ति (Mother of pearl) कई कारणों से इस वर्ग की एक आदर्श औषधी है ।  

मुक्ताशुक्ति का अम्लता-निरोधक (Acid-neutralizing) कर्म इसे आमाशय में मौजूद अत्यधिक अम्लता-निवारण (Acid antagonism) करने के लिए एक आदर्श औषधी बनाता है। यही कारण है कि मुक्ताशुक्ति का उपयोग अम्लपित्त (APD) के साथ-साथ छर्दि (Vomiting), पित्त-प्रधान अरुचि (Dyspepsia), व पित्तज-परिणामशूल (Peptic ulcer) में भी किया जाता है।

अम्लपित्त होने की स्थिति में, प्रत्येक रोगी में सम्प्राप्ति के आधार पर, उपरोक्त चारों वर्गों में से किसी एक अथवा अनेक औषधियों का युक्तपूर्वक प्रयोग अपेक्षित लाभ देता है।

अनुभव बताता है कि, क्योंकि अम्लपित्त के प्रत्येक रोगी में, सम्प्राप्ति के लगभग सभी घटक, कमोबेश रहते ही हैं, अतः उपरोक्त चारों वर्गों में से एक-एक मुख्य औषधी का चुनाव करके, उनका युक्तिसंगत मात्रा व कल्पना में उपयोग, इस रोग की चिकित्सा में आशातीत लाभ देता है। 

इसी आधार पर हमने, प्रत्येक वर्ग में से एक-एक मुख्य औषधी का चुनाव करके, चार मुख्य औषधियों का औषध-योग तैयार किया, तथा इसका अम्लपित्त (Hyperacidity), परिणामशूल (Acid Peptic Diseases), आम-पच्यमानाशयगत व्रण (Peptic ulcer), अजीर्ण (Dyspepsia), छर्दि (Vomiting), आमाशय-कला-शोथ (Gastritis) इत्यादि में, असंख्य रोगियों में, लगभग तीन दशक तक सफलतापूर्वक प्रयोग किया, व इससे आशातीत लाभ पाया।

इस औषध-योग को हमने लोसिड टैबलेट (LOCID Tablet) नाम दिया।

LOCID Tablet
(लोसिड) टैबलेट

• शटी इक्स्ट्रैक्ट 250 mg (2.5 ग्राम शटी चूर्ण के बराबर)
• मधुयष्टी इक्स्ट्रैक्ट 225 mg (2.25 ग्राम मधुयष्टी चूर्ण के बराबर)
• भृंगराज इक्स्ट्रैक्ट 175 mg (1.75 ग्राम भृंगराज चूर्ण के बराबर)
• मुक्ताशुक्ति भस्म  150 mg

मात्रा: 1-2 टैबलेट, भोजन के तत्काल बाद, दिन में तीन बार
निर्देश: अम्लपित्त (Hyperacidity), परिणामशूल (Acid Peptic Diseases), आम-पच्यमानाशयगत व्रण (Peptic ulcer), अजीर्ण (Dyspepsia), छर्दि (Vomiting), आमाशय-कला-शोथ

Dr.vasishth md kayachikitsa

irregular menstrual cycles treatment

Payal K:
Dear Vaidyas...one case of 28 yr old married female, k/c/o bil pcod has irregular menstruation , pittapradhan kaphanubandha prakruti, has history of parikartika ( fissures) on and off, stress .initially was on allopathic HRT for menstruation. When she started taking Ayurveda meds she felt better and had one cycle after 40 days..
   Now again the same problem..more than 50 days have passed no period yet

Can anyone suggest treatment experiences?
  In fairly many patients they get periods regularly for some months and then it gets delayed.

Dear madam

Vaat is blocked by kafa specifically apan Vaayu

Kafavaatshamak Bastis
RAS dhatu gat Aampachan
Is a general sutra

But your patient seems to have Kafa and pitta both blocking Vaata
So Start with shadangodak for pachan
Hingwastak for anuloman 7 days atleast
And then jump on Bastis

Vinaya Ballakur:
Have positive results with Rasa Shala preparation kuberaksha yoga.
Just one or two pills with hot water in the evening is sufficient to regularise periods. Only thing is bleeding must be monitored. If heavy it can be discontinued during periods and then started after complete cessation for the next period to appear on time.

The other drug that really works is Chandraprabhavati in one gm dosage BD. It is a complete medicine that is vatalomaka, shothahara, rasayana and tridoshamaka. Works better with a guggulu preparation that is Lekhan, shothahara and abhyantara vranashodhaka like Triphala guggulu, kanchanar guggulu etc.

Another important lekhan and abhyantara vranashodhaka is varunadi kwatha. Sukumara kwatha restores hormonal balance.

I usually combine combine two or three of the above mentioned medicines.

Boiled water consumption should be advised.

Some counseling may be required. If facing personal problems those needed to be sorted out with family.

Her symptoms are those of pitta aggravation.
Pitta shamaka  chikitsa will help her.
Praval bhasma, Mukta bhasma can be given. Kamdudha ras is a great combination.
Sukumara ghritha, shatavari churna are other medicines that can be combined.
Himsagar thaila application over head can be recommended.

Stop rajasika and tamasika items and advice saatvika diet and lifestyle.

Home remedie for menstrual pain

Remedy for mensuration pain or cramps: Needed: 100ml of water 1 table spoon of Fennel Seeds also called Saunf in hindi and Sombu in tamil. 1/2 spoon of sugar or 1 spoon of palm jaggery or brown sugar. What to do: Take this 100ml of water and allow it to boil. During light heat, add this 1 table spoon of this fennel seed. allow it to boil still the water cosisitancy becomes half of the qty and color changes. Then add either palm jaggery sugar 1 spoon or 1/2 white sugar. filter it.. and drink this Kashayam during your mensuration time. By drinking regularly you will not have cramps or severe pain.

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